Sharabi Shayari

मस्ती निगाहे-नाज की कैफे-शबाब में,
जैसे कोई शराब मिला दे शराब में।

तुम्हारी बेरूखी ने लाज रख ली बादाखाने की,
तुम आंखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते।

देखा किये वह मस्त निगाहों से बार-बार,
जब तक शराब आई कई दौर चल गये।

तुम्हारी बेरूखी ने लाज रख ली बादाखाने की,
तुम आंखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते।

देखा किये वह मस्त निगाहों से बार-बार,
जब तक शराब आई कई दौर चल गये।

तुम आज साक़ी बने हो तो शहर प्यासा है,
हमारे दौर में ख़ाली कोई गिलास न था।

थोड़ी सी पी शराब थोड़ी सी उछाल दी,
कुछ इस तरह से हमने जवानी निकाल दी।

यूँ बिगड़ी बहकी बातों का कोई शौक़ नही है मुझको,
वो पुरानी शराब के जैसी है असर सर से उतरता ही नहीं।

मेरी तबाही का इल्जाम अब शराब पर है,
करता भी क्या और तुम पर जो आ रही थी बात।

कहीं सागर लबालब हैं कहीं खाली पियाले हैं,
यह कैसा दौर है साकी यह क्या तकसीम है साकी।